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हकदारी से परिणामों तक: ग्रामीण रोजगार नीति में बदलाव की बहस


 हकदारी से परिणामों तक: ग्रामीण रोजगार नीति में बदलाव की बहस


भारत में सार्वजनिक नीतियों का मूल्यांकन भावनाओं या प्रतीकों के बजाय उनके वास्तविक परिणामों से किया जाना चाहिए। इसी कसौटी पर देखें तो महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एमजीएनआरईजीए) को विकसित भारत रोजगार और आजीविका मिशन ग्रामीण अधिनियम, 2025 (वीबीजीआरएएम-जी) से बदलने का निर्णय एक बड़ी नीतिगत बहस को जन्म देता है। विरोध करने वाले इसे अधिकारों पर चोट, राज्यों पर अतिरिक्त बोझ, केंद्रीकरण की कोशिश और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की विरासत से दूरी के रूप में देखते हैं लेकिन गहराई से देखने पर यह बहस राजनीतिक भावनाओं से अधिक और नीति सुधार की जरूरतों से कम जुड़ी दिखाई देती है।
एमजीएनआरईजीए को अधिकार-आधारित कानून के रूप में पेश किया गया था, लेकिन दो दशकों का अनुभव बताता है कि कानूनी हकदारी अपने आप सशक्तिकरण में नहीं बदलती। मजदूरी भुगतान में देरी, काम की अधूरी मांग, खराब गुणवत्ता की परिसंपत्तियां और राज्यों में असमान क्रियान्वयन ने इस अधिकार को कमजोर किया। जब कोई अधिकार समय पर, पर्याप्त मात्रा में और निरंतर नहीं मिल पाता, तो वह व्यावहारिक रूप से अधिकार नहीं रह जाता। वीबीजीआरएएम-जी इस जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटता, बल्कि समयबद्धता, परिणाम-आधारित फंडिंग और जवाबदेही को मजबूत कर राज्य की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करता है।
यह बदलाव भारत की विकास सोच में एक आवश्यक परिवर्तन को भी दर्शाता है। एमजीएनआरईजीए को मूल रूप से ग्रामीण संकट के दौर में राहत उपाय के तौर पर तैयार किया गया था। लेकिन संकट रोजगार को स्थायी व्यवस्था बना देना विकास की गति को रोक देता है। वीबीजीआरएएम-जी अल्पकालिक रोजगार को कौशल विकास, आजीविका सृजन और टिकाऊ संपत्ति निर्माण से जोड़ता है। यह मान्यता देता है कि गरिमा केवल काम के दिनों की गिनती से नहीं, बल्कि स्थायी आय, उत्पादकता और आगे बढ़ने की क्षमता से आती है। ऐसी कल्याण व्यवस्था जो समय के साथ खुद को नहीं बदलती, वह गरीबी हटाने के बजाय निर्भरता को बढ़ावा देती है।
राज्यों पर बढ़े हुए वित्तीय बोझ की आशंका भी तथ्यों की कसौटी पर कमजोर पड़ती है। पुराने ढांचे में केंद्रीय फंड की देरी, अनिश्चित दायित्व और लागत साझा करने को लेकर विवाद आम थे। वीबीजीआरएएम-जी स्पष्ट वित्तीय भूमिकाएं, मध्यम अवधि की योजना और परिणाम-आधारित फंडिंग की व्यवस्था करता है। इससे राज्यों को बेहतर योजना बनाने की क्षमता मिलती है और वास्तविक संघवाद को मजबूती मिलती है।
केंद्रीकरण के आरोप भी अक्सर भ्रम पैदा करते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर समान मानक तय करना और स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन में फर्क होता है। वीबीजीआरएएम-जी में स्थानीय संस्थाओं की भूमिका बनी रहती है—कार्य चयन, परियोजना निष्पादन और निगरानी स्थानीय स्तर पर ही होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब प्रदर्शन और जवाबदेही पर ज्यादा जोर है। बिना निगरानी के विकेंद्रीकरण का लाभ अक्सर बिचौलियों को मिला है, मजदूरों को नहीं।
सबसे भावनात्मक बहस महात्मा गांधी के नाम को कानून से हटाने को लेकर है। लेकिन गांधी जी की आर्थिक सोच आत्मनिर्भरता, उत्पादक श्रम और विकेंद्रीकृत विकास पर आधारित थी। केवल नाम बनाए रखना और व्यवस्था की अक्षमताओं को जारी रखना उनकी विरासत का सम्मान नहीं है। टिकाऊ आजीविका, स्थानीय उद्यम और सामुदायिक संपत्ति निर्माण पर केंद्रित नीति गांधीवादी मूल्यों के कहीं अधिक करीब है।
सुधार स्वाभाविक रूप से विरोध को जन्म देते हैं, खासकर जब वे स्थापित राजनीतिक कथाओं को चुनौती देते हैं। लेकिन सामाजिक नीतियां स्थिर नहीं रह सकतीं। बदलती जनसांख्यिकी, वित्तीय सीमाएं और विकास की आकांक्षाएं ऐसे कार्यक्रमों की मांग करती हैं जो मापने योग्य और टिकाऊ परिणाम दें। वीबीजीआरएएम-जी इसी दिशा में एक प्रयास है—हकदारी से आगे बढ़कर परिणाम-आधारित ग्रामीण समृद्धि की ओर। अंततः विकल्प दया बनाम दक्षता या अधिकार बनाम सुधार का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या हम बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप कल्याण व्यवस्था चाहते हैं या ऐसे ढांचों से चिपके रहना चाहते हैं जिनकी सीमाएं लंबे समय से उजागर हो चुकी हैं। वीबीजीआरएएम-जी इसी सोच में बदलाव का संकेत देता है, और यही बहस का केंद्र होना चाहिए।

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