झीरम घाटी हत्याकांड: लोकतंत्र पर हुआ वह हमला जिसे छत्तीसगढ़ कभी नहीं भूल सकता
25 मई 2013 की वह भयावह शाम, जिसने पूरे छत्तीसगढ़ को झकझोर दिया
विशेष लेख- के पी श्रीवास प्रधान संपादक
25 मई 2013... छत्तीसगढ़ के इतिहास में दर्ज वह काला दिन, जिसे प्रदेश शायद ही कभी भूल पाएगा। बस्तर की झीरम घाटी में उस दिन जो कुछ हुआ, उसने न केवल छत्तीसगढ़ की राजनीति को गहरे तक प्रभावित किया, बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।
कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा का काफिला बस्तर के दरभा क्षेत्र से गुजर रहा था। इसी दौरान घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरी झीरम घाटी में पहले से घात लगाए बैठे माओवादी हमलावरों ने काफिले पर हमला कर दिया। अचानक हुई गोलीबारी और विस्फोटों से पूरा इलाका दहल उठा। इस हमले में कांग्रेस के कई बड़े नेता, कार्यकर्ता और सुरक्षाकर्मी मारे गए।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, इस हमले में 27 लोगों की मौत हुई और 38 लोग घायल हुए। मृतकों में 10 पुलिसकर्मी भी शामिल थे।
परिवर्तन यात्रा बनी निशाना
उस समय छत्तीसगढ़ में कांग्रेस द्वारा परिवर्तन यात्रा निकाली जा रही थी। इसका उद्देश्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में जनता से संपर्क करना और राजनीतिक संदेश को लोगों तक पहुंचाना था।
25 मई को यात्रा बस्तर के इलाके में पहुंची। दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी भौगोलिक रूप से बेहद दुर्गम और घने जंगलों से घिरी हुई है। इसी क्षेत्र में माओवादियों ने काफिले को निशाना बनाया।
हमला इतना अचानक और भीषण था कि काफिले में शामिल लोगों को संभलने का पर्याप्त मौका तक नहीं मिला। चारों तरफ से गोलियां चलने लगीं। हमलावरों ने राजनीतिक नेताओं के साथ सुरक्षा में तैनात जवानों को भी निशाना बनाया।
कुछ ही समय में झीरम घाटी का शांत जंगल चीख-पुकार, गोलियों और विस्फोटों की आवाज से गूंज उठा।
छत्तीसगढ़ ने खोए कई बड़े नेता
इस हमले में प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा सहित कई प्रमुख कांग्रेस नेताओं की जान चली गई।
वरिष्ठ नेता विद्या चरण शुक्ल भी हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे। बाद में उपचार के दौरान उनका निधन हो गया।
महेंद्र कर्मा को बस्तर में माओवादी हिंसा के खिलाफ अपनी मुखर भूमिका के लिए जाना जाता था। उनके निधन ने बस्तर सहित पूरे छत्तीसगढ़ में गहरा शोक पैदा कर दिया।
एक ही हमले में प्रदेश के कई वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं का चले जाना छत्तीसगढ़ की राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति थी।
केवल राजनीतिक हमला नहीं, लोकतंत्र पर चोट
झीरम घाटी की घटना को केवल एक नक्सली हमले के रूप में देखना इस घटना की गंभीरता को कम करके आंकना होगा।
राजनीतिक दलों के नेता जनता के बीच अपनी बात रखने और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा कर रहे थे। ऐसे लोगों को निशाना बनाया जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर चुनौती थी।
लोकतंत्र में विचारों का विरोध किया जा सकता है, राजनीतिक नीतियों की आलोचना की जा सकती है, चुनाव में मुकाबला किया जा सकता है, लेकिन राजनीतिक मतभेदों का जवाब बंदूक और हिंसा से देना किसी भी स्थिति में लोकतांत्रिक रास्ता नहीं हो सकता।
बस्तर की हिंसा का लंबा इतिहास
झीरम घाटी की घटना बस्तर में लंबे समय से चली आ रही माओवादी हिंसा की भयावह तस्वीर का हिस्सा थी।
बस्तर के दूरदराज इलाकों में वर्षों से सुरक्षा बलों, जनप्रतिनिधियों, सरकारी कर्मचारियों और आम नागरिकों को हिंसा का सामना करना पड़ा है।
इस संघर्ष में अनेक जवानों ने अपनी जान गंवाई, तो कई निर्दोष ग्रामीण भी हिंसा की चपेट में आए। विकास कार्य भी प्रभावित हुए और बस्तर के कई क्षेत्रों में भय का वातावरण बना रहा।
झीरम घाटी का हमला इसी लंबे संघर्ष का एक ऐसा अध्याय था, जिसने पूरे देश का ध्यान बस्तर की ओर खींच दिया।
NIA ने संभाली जांच
घटना की गंभीरता को देखते हुए मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA को सौंपी गई।
NIA ने मामले को RC-06/2013/NIA/DLI के रूप में दर्ज किया। जांच के दौरान कई आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र और पूरक आरोपपत्र दाखिल किए गए।
जांच में हत्या, हत्या का प्रयास, हथियारों के इस्तेमाल, विस्फोटक पदार्थों और गैरकानूनी गतिविधियों से संबंधित विभिन्न कानूनी प्रावधानों को शामिल किया गया।
इस मामले की जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि इसमें केवल व्यक्तिगत हत्या का मामला नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक यात्रा और लोकतांत्रिक गतिविधि को निशाना बनाया गया था।
वर्षों बाद भी न्याय की उम्मीद
झीरम घाटी की घटना को वर्षों गुजर चुके हैं, लेकिन इस हमले की याद आज भी लोगों के जेहन में ताजा है।
जिन परिवारों ने अपने परिजनों को खोया, उनके लिए समय बीतने से दर्द पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। उनके लिए न्याय केवल अदालत का फैसला नहीं, बल्कि उस सच्चाई का सामने आना भी है कि आखिर इस भयावह हमले की पूरी साजिश के पीछे कौन लोग थे और किस तरह इसे अंजाम दिया गया।
न्याय की प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून के माध्यम से दोषियों तक पहुंचना ही स्थायी रास्ता है।
शहीदों की याद आज भी जिंदा
25 मई आते ही छत्तीसगढ़ में झीरम घाटी के शहीदों को याद किया जाता है।
यह दिन उन परिवारों के लिए बेहद भावुक होता है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया। किसी ने पिता खोया, किसी ने बेटा, किसी ने भाई और किसी ने अपना जीवनसाथी।
राजनीतिक दलों के लिए भी यह दिन केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि उस घटना से सबक लेने का दिन है।
बस्तर में शांति सबसे बड़ी जरूरत
झीरम घाटी की घटना हमें यह सवाल पूछने के लिए मजबूर करती है कि आखिर किसी भी समाज को हिंसा से बाहर निकालने का रास्ता क्या है?
सिर्फ सुरक्षा अभियान ही पर्याप्त नहीं हो सकते। सुरक्षा के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार, संचार और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार भी जरूरी है।
बस्तर के आम नागरिकों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि सरकार और प्रशासन उनके साथ खड़े हैं। विकास और विश्वास की मजबूत नींव ही हिंसा के वातावरण को स्थायी रूप से कमजोर कर सकती है।
लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प
झीरम घाटी में मारे गए लोगों की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि देश और प्रदेश लोकतंत्र को और मजबूत करें।
राजनीतिक विचार अलग-अलग हो सकते हैं। सरकारें बदल सकती हैं। दलों की नीतियां अलग हो सकती हैं। लेकिन लोकतंत्र में असहमति का जवाब हिंसा नहीं हो सकता।
राजनीतिक संघर्ष चुनाव, संवाद और विचारों के माध्यम से होना चाहिए।
झीरम घाटी की घटना हमें यही सबसे बड़ा संदेश देती है कि बंदूक से विचारों को खत्म नहीं किया जा सकता और हिंसा से लोकतंत्र को हराया नहीं जा सकता।
इतिहास का वह अध्याय जिसे भूलना नहीं चाहिए
25 मई 2013 को झीरम घाटी में हुआ हमला छत्तीसगढ़ के इतिहास का एक अत्यंत दुखद अध्याय है।
उस दिन कई परिवार उजड़ गए। प्रदेश ने अपने अनेक जनप्रतिनिधियों और सुरक्षाकर्मियों को खो दिया। बस्तर के लोगों ने एक बार फिर हिंसा का भयावह चेहरा देखा।
आज वर्षों बाद भी झीरम घाटी का नाम लेते ही उस दिन की तस्वीरें आंखों के सामने आ जाती हैं।
समय आगे बढ़ता है, सरकारें बदलती हैं और परिस्थितियां बदलती हैं, लेकिन इतिहास की कुछ घटनाएं आने वाली पीढ़ियों को लगातार सावधान करती रहती हैं।
झीरम घाटी ऐसी ही एक घटना है।
यह केवल अतीत की त्रासदी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए एक चेतावनी है—
लोकतंत्र की राह संवाद से मजबूत होती है, हिंसा से नहीं।
झीरम घाटी के सभी शहीदों को विनम्र श्रद्धांजलि।

